वर्तमान समय में नैतिकता के ह्रास:चरमोत्कर्ष पर जिम्मेदार कौन?
डॉ यू एस गौड़ (समाज विश्लेषक)
जिला संघचालक हाथरस
भारतीय आधुनिक समाज जहां एक ओर तकनीकी प्रगति, आर्थिक समृद्धि और वैज्ञानिक उपलब्धियों के शिखर को छू रहा है, वहीं दूसरी ओर मानवीय मूल्यों और नैतिकता पर गंभीर संकट आ खड़ा हुआ है। प्रतिदिन भ्रष्टाचार, आत्महत्या संवेदनहीनता, धोखाधड़ी ,पति पत्नी के बीच बढ़ते विश्वासघात की घटनाएं न केवल समाज को झकरोर रही है बल्कि भय से भरे वातावरण का निर्माण कर रही है । वेदना का विषय यह भी है कि इन घटनाओं को समाचार पत्र,सोशल मीडिया प्रमुखता से प्रकाशित करता है और बार बार करता है क्यों इसके पीछे बढ़ती टी आर पी जो है। अच्छी नैतिकता से ओतप्रोत समाचार तो प्रकाशन से बाहर है उनको कोई नहीं छापता।
ऐसे में यह सवाल उठना आवश्यक है कि इस नैतिक पतन के लिए वास्तव में जिम्मेदार कौन है? क्या कोई एक इकाई इसके लिए दोषी है, या यह पूरी व्यवस्था का सामूहिक परिणाम है?
में सामाजिक विश्लेषक हु इसलिए इस गंभीर समस्या पर मेरा विश्लेषण कुछ इस प्रकार है

- अध्यात्मवाद को त्याग भौतिकवाद का बढ़ता चलन
आधुनिक समाज की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हमने ‘होने’ से ज्यादा ‘दिखने’ को महत्व देना शुरू कर दिया है। आज व्यक्ति की पहचान उसके चरित्र, ईमानदारी या ज्ञान से नहीं, बल्कि उसके वैभव गाड़ी, बंगले और बैंक बैलेंस से होती है।
फलस्वरूप पैसे कमाने की इस अंधी दौड़ ने “साध्य ही साधन का औचित्य है” वाली मानसिकता को जन्म दे दिया है और येन केन प्रकारेंन माध्यम से सभी पैसा कमाने में लगे है। - समाप्त होते कुटुंब और एकाकीपन का प्रवेश
अतीत में, संयुक्त परिवार बच्चों के लिए नैतिकता की पहली पाठशाला होते थे। दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियों के माध्यम से बच्चों में अनजाने ही त्याग, सहयोग और सहानुभूति के बीज अंकुरित हो जाते थे।
अब एकल परिवारों के बढ़ते चलन और माता-पिता दोनों के कामकाजी होने के कारण, बच्चों को वह पारंपरिक ‘नैतिक छाता’ नहीं मिल पा रहा है। अब बच्चों का खालीपन माता-पिता के समय की बजाय महंगे संसाधनों से भरा जा रहा है। - शिक्षा प्रणाली का ध्यान केवल व्यावसाय
हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली ‘चरित्र निर्माण’ की बजाय केवल ‘कैरियर निर्माण’ पर केंद्रित हो गई है। स्कूल और कॉलेज बालकों को बालक नहीं अपितु उत्पादन मान कर डिग्रियां तो बांट रहे हैं, किंतु संवेदनशील इंसान बनाने में असमर्थ है ।
: पाठ्यक्रम से नैतिक शिक्षा प्रायः मृत है नैतिक शिक्षा को या तो पाठयक्रम से हटा दिया गया है या उसे केवल पास होने के लिए एक औपचारिक विषय बना दिया गया है। जब शिक्षा का उद्देश्य केवल ‘पैकेज’ पाना रह जाएगा, तो वहां से देश के जिम्मेदार नागरिक नहीं, बल्कि संवेदन शून्य मशीनें ही निकलेंगी। जबकि समाज शास्त्री और विद्वान अरस्तु यह सिद्ध कर चुके है कि बिना समाज के कोई व्यक्ति नहीं रह सकता और जो रहने की कोशिश कर रहा है वह या तो ईश्वर है या मानसिक विक्षिप्त। - धर्म को पुर्नस्थापित करने का संकल्प लेने वाले व्यवसाई हैं।
संत महात्मा,समाज शास्त्री,और अन्य आध्यात्मिक लोग अधर्म पर धर्म की पताका फहराने का संकल्प लेने वाले पथ भ्रष्ट होकर अर्थप्रधान कर्म करने लगे,नैतिकता की कथा कहने वाले नाच गाने और फूहड़ता में पड़ गए समाज में धर्म का जागरण करने वाले लोग स्वयं धर्म की आचार संहिता को भूल गए। - आदर्शवादियों का संकट
किसी भी समाज के नैतिक मानदंड इस बात से तय होते हैं कि उस समाज के मार्गदर्शक (नेता, अभिनेता, बुद्धिजीवी) कैसा आचरण कर रहे हैं। वर्तमान समय में राजनीति, व्यवसाय और मनोरंजन जगत के शीर्ष लोगों में मूल्यहीनता साफ देखी जा सकती है। जब समाज देखता है कि नियम तोड़ने वाले और भ्रष्ट लोग सत्ता और सम्मान का आनंद ले रहे हैं, तो आम आदमी का भी ईमानदारी से भरोसा उठने लगता है।
नैतिकता को बचाने की जिम्मेदारी किसकी?
नैतिकता के ह्रास के लिए हम किसी एक व्यक्ति समाज या धर्म को नहीं मन सकते बल्कि हम सब सामूहिक रूप से जिम्मेदार हैं।
जहां समाज में, हमने ईमानदार व्यक्ति को ‘बेवकूफ’ और चालाक-भ्रष्ट व्यक्ति को ‘सफल’ मानना शुरू कर दिया है।
माता-पिता के रूप में, हम बच्चों से अच्छे अंकों की जिज्ञासा तो रखते है किंतु अच्छा इंसान बनने पर जोर नहीं देते।
एक नागरिक के रूप में, हम अपने अधिकारों के प्रति तो सजग हैं, लेकिन कर्तव्यों से आंखें बंद किये हुए हैं।
समाधान की राह: नैतिकता को वापस लाने के लिए बदलाव की शुरुआत व्यक्तिगत स्तर से करनी होगी। जब तक हम ‘सफलता’ के पैमाने को केवल धन-दौलत से बदलकर चरित्र और सेवा भाव से नहीं जोड़ेंगे, तब तक यह ह्रास थमेगा नहीं। शिक्षा में मूल्यों की वापसी, परिवारों में संवाद और सोशल मीडिया के प्रति आत्म-नियंत्रण ही इस संकट से उबरने का एक मात्र मार्ग है और इस मार्ग पर दृढ़ता से आगे बढ़ना होगा।

